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पांच हजार लोगों को घेर कर मार डाला गया था, महुआ डाबर की उस नृशंस घटना को याद कर दी गई श्रद्धांजलि


पांच हजार लोगों को घेर कर मार डाला गया था, महुआ

 डाबर की उस नृशंस घटना को याद कर दी गई

 श्रद्धांजलि


 बस्ती. महुआ डाबर एक ऐसा गांव जहां के करीब 5 हजार बाशिंदों की नृशंस हत्या कर तहस-नहस कर दिया गया था बल्कि इतिहास से इसका वजूद पूरी तरह से मिटा देने के लिए करीब 50 किलोमीटर दूर इसी नाम का नया गांव बसा दिया गया था। इ गांव को जलाए जाने की बरसी पर महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा महुआ डाबर स्मरण दिवस का आयोजन किया गया। 

"महुआ डाबर स्मृति दिवस 2025 में शहीदों को श्रद्धांजलि देते लोग, महुआ डाबर संग्रहालय बस्ती में 1857 क्रांति के वीरों की स्मृति में आयोजन"


इस मौके पर 'हज़ारों शहीदों की ज़मींदोज़ बस्ती' पर स्वतंत्रता संग्राम के ज्ञात-अज्ञात शहीदों को नमन किया गया.महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राना ने महुआ डाबर को जलाये जाने की बरसी के अवसर पर कहा कि यह घटना आजादी की लड़ाई लड़ रहे भारत के लोगों पर अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता की ऐसी कहानी है जिसे कभी भी नहीं भूला जा सकता। महुआ डाबर के आजादी पसंद वीर सेनानी अंग्रेजी सत्ता को मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। अंग्रेजी हुकुमत ने चंद गद्दारों की मदद से महुआ डाबर पर बेइंतहां जुल्म किए और अंत में करीब 5 हजार लोगों को घेर कर मार डाला। आज का दिन इन शहीदों को नमन करने का और उन्हें याद करने का है।

इस मौके पर डॉ. संजीव कुमार मौर्य, फकीर मोहम्मद, नासिर खान, यशवंत आदि ने भी विचार व्यक्त किया. रमजान खान,मुम्ताज अली खान, ताहिर अली वसीम खान,अशफाक,आलम खान, मुहम्मद गुलाम, नजर आलम आदि ने महुआ डाबर के शहीदों के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया. कार्यक्रम का संचालन बुद्ध विक्रम सेन ने किया.


वक्ताओं ने कहा कि- सर इतने दिए कि सर हो गया मैदान ए वतन, तुम  पर  हम फूल  चढ़ाते  हैं  शहीदाने वतन l

बताया कि क्रूर अंग्रेजी हुकूमत ने आज से 168 साल पहले 3 जुलाई 1857 को बस्ती जनपद के बहादुरपुर ब्लॉक अंतर्गत महुआ डाबर गांव को अंग्रेजी छुड़सवार फौजों की मदद से तीन तरफ से घेरकर गोलियों से छलनी कर दिया था। बूढ़े-बच्चे, महिलाओं को टुकड़े-टुकड़े करने के बाद आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं महुआ डाबर के सभी मकानों, दुकानों, हरकरघा कारखानों को जमींदोज करके ‘गैर चिरागी’ बना दिया। 


करीब 5000 लोगों को घेर कर मार दिया गया था और महुआ डाबर नाम के गांव की पहचान मिटा कर करीब 50 किलोमीटर दूर उसी नाम का नया गांव बसा कर असली जगह की पहचान छिपाने की बड़ी साजिश हुई। इतिहास छिप नहीं सकता, दशकों बाद खुदाई में जमीन में दबी गांव की सच्चाई सामने आई, लेकिन हैवानियत की इतनी बड़ी घटना पर गुनहगारों की तरफ से कभी अफसोस का एक लफ्ज तक नहीं कहा गया।

ब्यूरो रिपोर्ट 

AKP न्यूज 786



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